नाम भी अनुपम, काम भी अनुपम

टिल्लन रिछारिया

पर्यावरण के क्षेत्र में अनुपम मिश्र का नाम बरसों तक याद किया जाएगा।

तालाबों को बनाने-बचने के प्रति उन्होंने अद्भुत चेतना जगाई। उनकी लिखी `आज भी खरे हैं तालाब’ अविस्मरणीय किताब है। इस लेख में वरिष्ठ पत्रकार टिल्लन रिछारिया खुद भी अनुपम मिश्र को याद कर रहे हैं, और सुप्रसिद्ध पत्रकार श्री प्रभाष जोशी के जरिये भी लोगों को उनकी सादगी, सरलता और बेमिसाल जिंदगी की याद दिला रहे हैं। आदमी का आदमी बने रहना कठिन साधना है। अनासक्त भाव से अपने सृजन की निरंतरता को जीवंत रखना। सहज सरल प्रस्तुति से कृतित्व को जनोपयोगी बनाना। … और लाभेक्षा से परे जन जन तक पहुंचाने के सिलसिले को निर्बाध बनाये रखने वाले युगचेता कर्मवीर पर्यावरणविद अनुपम मिश्र अपने नाम और काम दोनों से अनुपम हैं ।
जब जो सामने होता है बहुत गतिमान होता है , नज़र नहीं ठहरती , प्रवाह बहुत तेज होता है… आप कैसे अंजोरते हैं यह आपकी वृत्ति पर निर्भर है। आपकी ग्राह्यता पर निर्भर करता है। अनुपम जी के सन्दर्भ में उन्हें परखने के बौद्धिक आकलन बौने लगते हैं , उनके अंदाज़ से कहें तो उन्होंने कुछ किया तो है नहीं , उनका जो भी आभामंडल बना है वह उन्होंने जिया है। … एक अनुपम बनने प्रक्रिया मे हम उन्हें कई विधाओं और विद्याओं में धूनी रमाये पाते हैं। शब्द , मंतव्य और भाव से पहले , अगर आपने उनकी लिखी कोई रचना देखी है तो , सबसे पहले प्रवहमान और लयबद्ध अक्षर मोहते हैं। इस चाक्षुष अभियान के साथ छोटे छोटे गागर में सागर भरे वाक्य विन्यास अपना मंतव्य प्रक्षेपित करते हैं। एक पैराग्राफ एक अध्याय की गरिमा के साथ आकार लेता है। शब्दों की यह यात्रा जब किताब बनने की प्रक्रिया से गुजरती है तो टाइप फॉण्ट के चयन से ले कर प्रस्तुति के विविध आयामों में सहजता सरलता के आग्रह के साथ कलात्मक अभिरुचि जीवंत प्रमाण मिलते हैं। … जब एक किताब ‘ आज भी खरे हैं तालाब ‘ अपने अस्तित्व मे आती है तो देखिये क्या होता है , इस किताब क्रान्ति के तमाम किस्से हमारे आपके आसपास अनंत काल तक तैरते रहेंगे —
आज भी खरे हैं तालाब, प्रसिद्ध पर्यावरणविद अनुपम मिश्र द्वारा लिखित हिन्दी पुस्तक है। यह 1993 में प्रकाशित हुई थी। यह पुस्तक परम्परागत तालाबों एवं जल-प्रबंधन से सम्बन्धित है तथा आठ वर्ष के गहन क्षेत्र-अनुसंधान के पश्चात लिखी गयी थी। भारत में बेजोड़ सुंदर तालाबों की कैसी भव्य परंपरा थी, पुस्तक उसका पूरा दर्शन कराती है। तालाब बनाने की विधियों के साथ-साथ अनुपम जी की लेखनी उन गुमनाम नायकों को भी अंधेरे कोनों से ढूँढ़ लाती है, जो विकास के नए पैमानों के कारण बिसरा दिए गए हैं।अनुपम जी ने अपनी पुस्तकों को कॉपीराइट-मुक्त रखा है। इसी कारण ‘ आज भी खरे हैं तालाब ‘पुस्तक का अब तक ब्रेल लिपि सहित 19 भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है। सामाजिक पुस्तकों में महात्मा गाँधी की पुस्तक ‘ माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ ‘ के बाद केवल यही एक पुस्तक ब्रेल लिपि में उपलब्ध है।
बात किताबों की चल रही है तो पूरी बात साफ़ हो जाए। इस कॉपीराइट मसले पर अनुपम जी का एक बेबाक और आँख खोलने वाला इंटरव्यू है , जो विस्फोट के संजय मिश्र जी ने लिया है, मुझे बहुत पसंद है। उसके कुछ अंश प्रस्तुत करना जरूरी है। … “कापीराईट क्या है इसके बारे में मैं बहुत जानता नहीं हूं। लेकिन मेरे मन में जो सवाल आये और उन सवालों के जवाब में मैंने जो जवाब तलाशे उसमें मैंने पाया कि आपका लिखा सिर्फ आपका नहीं है। आप एक जीवन में समाज के किस हिस्से कब और कितना सीखते, ग्रहण करते हैं इसकी कोई लाइन खींचना कठिन काम है। पहला सवाल तो यही है कि मेरे दिमाग में जो है वह क्या केवल मेरा ही है? अगर आप यह मानते हैं कि आपका लिखा सिर्फ आपका है तो फिर आपको बहुत कुछ नकारना होगा।अपने आपको एक ऐसी इकाई साबित करना होगा जिसका किसी से कोई व्यवहार नहीं है। न कुल परिवार से न समाज से। क्योंकि हम कुल, परिवार, समाज में बड़े होते हुए ही बहुत कुछ सीखते हैं और उसी से हमारी समझ बनती है। अगर आप कापीराइट का इतिहास देखें तो पायेंगे कि हमारे समाज में कभी कापीराइट की कोई प्रवृत्ति नहीं थी। अपने यहां कठिनतम श्रम से प्राप्त की गयी सिद्धि को भी सिर्फ सेवा के निमित्त उपयोग की जाती है। मीरा, तुलसी, सूरदास नानक ने जो कुछ बोला, लिखा वह सब हाथ से कॉपियां लिखी गयीं। तमिलनाडु में ऐसे हजारों ग्रंथ हैं जो हाथ से लिखे गये और हाथ से लिखे ग्रंथ भी दो-ढाई हजार साल से अनवरत शुद्धतम स्वरूप में जिंदा रहे हैं। इसलिए यह कहना कि कापीराइट से मूल सामग्री से छेड़छाड़ होनी बच जाती है ऐसा नहीं है। जिनका जिक्र मैं कर रहा हूं वे सब बिना कापीराइट के भी शुद्धतम स्वरूप में लंबे समय तक बची रही हैं और आज भी विद्यमान हैं। उनको तो किसी कापीराइट एक्ट की जरूरत महसूस नहीं हुई फिर आपको क्यों होती है?कॉपीराइट का नियम अंग्रेजों के साथ भारत में आया लेकिन दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि किसी के मन में कभी यह सवाल और संदेह नहीं उठा कि आखिर हम कापीराइट का इस्तेमाल क्यों करें? महात्मा गांधी तक ने अपनी कापीराइट एक ट्रस्ट नवजीवन ट्रस्ट को पचास साल के लिए दे दिया था। अब पचास साल बाद गांधी के लिखे पर फिर कापीराइट हट गया है, तो फिर महज पचास साल के लिए इसका पालन करने से गांधी विचार भी नहीं बच सका। यह सब देखकर आश्चर्य होता ही है।”
अनुपम जी के व्यक्तित्व के कई फलक हैं , हर फलक एक महाकाव्य है। ज्यादा गहरे उतरने में भूलभुलैया में खोने का खतरा है। बतौर फोटोग्राफर अनुपम जी को जानते हैं आप , कभी मौका मिले जरूर देखिये उनकी तस्वीरें । पानी की बानी, तालाब , पर्यावरणविद के रूप तो उन्हें जरूर जानते होंगे आप पर क्या आप जानते हैं कि किसी जमाने में समाजवादी युवजन सभा, चौहत्तर के जे पी आंदोलन, चंबल के डाकुओं के समर्पण और चिपको आंदोलन में आप खासे सक्रिय थे। कभी प्रभाष जोशी जी की नज़र से भी अनुपम जी को देखिये। प्रभाष जोशी जी का बहुत चर्चित लेख है , जो उन्होंने ‘ कागद कारे ‘ कालम के तहत ‘ पर्यावरण का अनुपम, अनुपम मिश्र है, उसकी ‘पुण्याई’ पर हम जैसे जी रहे हैं ‘ शीषर्क से लिखा था।–
… “सर्वोदयी गतिविधियों का दिल्ली में केंद्र गांधी शांति प्रतिष्ठान हो गया और अनुपम और मैं – आंदोलन के बारे में लिखने, पत्रिकाएं निकालने और सर्वोदय प्रेस सर्विस चलाने में लग गए. उसी सिलसिले में अनुपम का उत्तराखंड आना-जाना होता.भवानी बाबू गांधी निधि में ही रहने आ गए थे, इसलिए कामकाज दिन-रात हो सकता था. फिर चमोली में चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी ने चिपको कर दिया. चिपको आंदोलन पर पहली रपट अनुपम मिश्र ने ही लिखी और चूंकि सर्वोदयी पत्रिकाओं की पहुंच सीमित थी, इसलिए वह रपट हमने रघुवीर सहाय को दी और दिनमान में उन्होंने उसे अच्छी तरह छापा.चिपको आंदोलन को बीस से ज्यादा साल हो गए, लेकिन अनुपम का उत्तराखंड से संबंध अब भी उतना ही आत्मीय है. जिसे हम पर्यावरण के नाम से जानते हैं, उसके संरक्षण का पहला आंदोलन चिपको ही था और वह किसी पश्चिमी प्रेरणा से शुरू नहीं हुआ. पेड़ों को काटने से रोकने के लिए शुरू हुए इस आंदोलन और इससे आई पर्यावरणीय चेतना पर कोई लिख सकता है तो अनुपम मिश्र. लेकिन कोई कहे कि वही लिखने के अधिकारी हैं तो अनुपम मिश्र हाथ जोड़ लेंगे. अपना क्या है जी, अपन जानते ही क्या हैं – उनकी छोटी बहन डॉक्टर नमिता (मिश्र) शर्मा भी इसी लहजे में कह सकती हैं.
“जनसत्ता निकला तो रामनाथ जी (गोयनका) की बहुत इच्छा थी कि अनुपम उसमें आ जाए. अपन ने भी समझाने-पटाने की बहुत कोशिश की, लेकिन अनुपम बंदा लौटकर पत्रकार नहीं हुआ.लेकिन इसके पहले कि अनुपम मिश्र पूरी तरह पर्यावरण के काम में पड़ते, बिहार आंदोलन छिड़ गया. हम लोग गांधी प्रतिष्ठान से एवरीमैंस होते हुए एक्सप्रेस पहुंच गए और ‘प्रजानीति’ निकालने लगे. तब भी दिल्ली के एक्सप्रेस दफ्तर में कोई विनम्र सेवक पत्रकार था तो अनुपम मिश्र. सबकी कॉपी ठीक करना, प्रूफ पढ़ना, पेज बनवाना, तम्बाकू के पान के ज़रिये प्रेस को प्रसन्न रखना और पत्रकार और आंदोलनकारी होने की हवा भी न खाना, झोला लटका के पैदल दफ्तर आना और जब भी काम पूरा हो, पैदल ही घर जाना. प्रोफेशनल जर्नलिस्टों के बीच अनुपम मिश्र विनम्र सेवक मिशनरी पत्रकार रहे. इमरजेंसी लगी, ‘प्रजानीति’ और फिर ‘आसपास’ बंद हुआ तो अनुपम को इस मुश्किल भूमिका से मुक्ति मिली.
“प्रोफेशनल पत्रकार हो सकने की तबीयत अनुपम मिश्र की नहीं है. क्यों नहीं है, यह आगे समझ में आएगा. इमरजेंसी में एक्सप्रेस से भी बुरे हाल ‘गांधी शांति प्रतिष्ठान’ के थे. बाबूलाल शर्मा की सेवाएं अब भी वहीं थी, वह वहां चले गए. मैं भी किसी तरह वहीं लौटा. लेकिन अनुपम मिश्र फ्रीलांसर हो गए. आपने बहुतेरे फ्रीलांसर देखे होंगे. अनुपम उनकी छवि में फिट नहीं हो सकता । लेकिन इमरजेंसी के उन दिनों में जो भी करने को मिल जाए, अच्छा और काफी था. अनुपम और उदयन शर्मा इधर-उधर लिखकर थोड़ा-बहुत कमा लेते. अनुपम फोटोग्राफी भी कर सकता है. लेकिन फोटो-पत्रकारिता से कोई आमदनी नहीं होती.
“इमरजेंसी उठी और चुनाव में जनता पार्टी की हवा बहने लगी तो कई लोग कहते कि अब हम लोगों के वारे-न्यारे हो जाएंगे. किसी को यह भी लगता कि प्रभाष जोशी तो चुनाव लड़ के लोकसभा पहुंच जाएगा. जेपी से निकटता को भला कौन नहीं भुनाएगा. लेकिन अपन एक्सप्रेस में चुनाव सेल चलाने में लगे और अनुपम वहां भी मदद करने लगा….जनता पार्टी जीती तो गांधी शांति प्रतिष्ठान से सरकारी दमन का साया हटा. अनुपम आखिर प्रतिष्ठान में काम करने लगा. अपना एक पांव एक्सप्रेस में और दूसरा शांति प्रतिष्ठान में. उन्हीं दिनों नैरोबी से राष्ट्रसंघ के पर्यावरण कार्यक्रम का पत्र मिला कि गांधी शांति प्रतिष्ठान भारत की स्वयंसेवी संस्थाओं का एक सर्वे कर के दे सकता है? हम इतने डॉलर सर्वे के लिए दे सकेंगे. यह भी ख्याल रखिए कि क्या ये संस्थाएं पर्यावरण का काम करने में रुचि ले सकती हैं. राधाकृष्ण जी और मुझे लगा कि यह सर्वे तो अनुपम ही सबसे अच्छा कर सकता है. उसे दिया गया और निश्चित समय में वह न सिर्फ पूरा हुआ, जितना खर्च मिला था, उसका एक तिहाई भी खर्च नहीं हुआ. उस सर्वे से अनुपम का देश की स्वयंसेवी संस्थाओं और पर्यावरण के काम में लगी विदेशी संस्थाओं से जो संपर्क हुआ, वह न सिर्फ कायम है, बल्कि जीवंत चल रहा है.लेकिन एक बार राधाकृष्ण जी ने अनुपम से कहा कि फलां-फलां विदेशी संस्था से इतना पैसा इस प्रोजेक्ट के लिए मिला है और हमारी इच्छा है कि इसमें से तुम पांच-छह हज़ार रुपये महीना ले लो. तब अनुपम के मित्र इससे ज्यादा वेतन सहज ही पाते थे और प्रोजेक्ट करने वाले को तो वे पैसे मिलने ही थे. लेकिन अनुपम घबराया-सा मेरे पास आया. वह प्रतिष्ठान की सात सौ रुपट्टी के अलावा कहीं से एक पैसा लेने को तैयार नहीं. विदेशी पैसा है. मैं जानता हूं, इफरात में मिलता है. इसे लेने वालों का पतन भी मैंने देखा है. अपने देश का काम हम दूसरों के पैसों से क्यों करें? “अगर आप अनुपम को जानते हों तो उसका संकोच एकदम समझ आ जाएगा. नहीं तो उस के मुंह पर तारीफ और पीठ पीछे बुद्धू कहने वालों में आप आसानी से शामिल हो सकते हैं….पिछले तीन साल से होशंगाबाद में नर्मदा किनारे उसके लिए पर्यावरण की कोई संस्था खड़ी करने के जुगाड़ में हूं. इसलिए भी देश के पर्यावरण के लिए नर्मदा योजना आरपार की साबित हो सकती हैं. लेकिन अनुपम को सरकारी जमीन और पैसा नहीं चाहिए. विदेशी पैसे को वह हाथ नहीं लगाएगा. और तो और, गांधी शांति प्रतिष्ठान छोड़कर अपना बनाया गांधी शांति केंद्र चला रहे राधाकृष्णजी से भी वह संस्था खड़ी करने के लिए एकमुश्त पैसा नहीं लेगा. कुछ उद्योगपतियों से पैसा ला सकता हूं, लेकिन मुझे मालूम है कि वे पैसा क्यों और कैसे देते हैं. और वह लाना अनुपम के साथ छल करना होगा।
“पर्यावरण का काम आजकल विदेश यात्रा का सबसे सुलभ मार्ग है. अनुपम एकाध बार तो नैरोबी गया, क्योंकि वहां पर्यावरण संपर्क केंद्र के बोर्ड में निदेशक बना दिया गया था. कुछ और यात्राएं वैसे ही कीं, जैसे आप-हम मेरठ या अलवर या चड़ीगढ़ हो आतेहैं. झोला टांगा और हो आए. मैं नहीं जानता कि बाहर बैठक में अंग्रेज़ी कैसे बोलता होता? बोलना ही नहीं चाहता. मुंह टेढ़ा कर अमेरिकी स्लैंग में अंग्रेजी बोलना तो अनुपम के लिए पापकर्म होगा….इस साल (1993) रियो में हुए विश्व सम्मलेन का कार्यक्रम तय करने के लिए पिछले साल फ्रांस सरकार की मदद से पर्यावरण संपर्क केंद्र ने पेरिस में सम्मलेन किया था. अनुपम को ही लोग भेजने थे. उसने भेजे, पर खुद ऐन मौके पर न कर गया. रियो भी नहीं गया. भारत सरकार या राज्य सरकारों को पर्यावरण पर सलाह वह नहीं देता. कमेटियों और प्रतिनिधिमंडलों में शामिल नहीं होता. गांधी शांति प्रतिष्ठान में चुपचाप सिर गड़ाए मनोयोग से काम करता रहता है. उसकी पुरानी कुर्सी के पीछे एक स्टिकर चिपका है – पॉवर विदाउट परपज – सत्ता बिना प्रयोजन के. अनुपम के पास प्रयोजन ही है, सत्ता का तो स्पर्श भी नहीं है. अभी तक वैसे ही तंगी में यात्रा करता है. जैसी हम जेपी आंदोलन के समय झोला लटकाए किया करते थे. और ज्यादातर यात्राएं बीहड़ सुनसान या रेगिस्तान या जंगलों में.अनुपम को लड़कपन में गिल्टी की टीबी हुई थी. अब फिर कोई टीबी हुई है. इस बीच उसके दिल ने भवानी बाबू वाला रास्ता पकड़ लिया था. नाड़ी कभी पचास हो जाए और कभी एक सौ पचास. दिल का चलना इतना अनियमित हो गया कि सब परेशान, कौन जाने, कब-क्या हो जाए. लड़-झगड़ कर डॉक्टर खलीलुल्लाह को दिखाया. उन्होंने गोली दी और कहा कि पेसमेकर लगवा लो. मन्ना, यानी भवानी बाबू को लगा ही था. लेकिन अनुपम ने न गोली ली, न पेसमेकर लगवाना मंजूर किया. निमोनिया कभी-भी हो जाए. मुझे और बनवारी (जो अनुपम के कॉलेज के दोस्त हैं) को लगे कि अनुपम में शहीद होने की इच्छा है, लेकिन अनुपम अपनी बीमारी से पर्यावरण का काम करते हुए और किताबें निकालते हुए लड़ रहा है….देश का पर्यावरण’ उसने कोई नौ साल पहले निकाली. संपादित है. लेकिन क्या जानकारी, क्या भाषा, क्या सज्जा और क्या सफाई. जिस दिलीप चिंचालकर ने जनसत्ता का मास्टहेड बनाया, अखबार डिज़ाइन किया, उसी दिलीप ने इस किताब का लेआउट, स्केचिंग और सज्जा की है. हिन्दी में ही नहीं, इस देश में अंग्रेजी में भी ऐसी किताब निकली हो तो बताना. लेकिन अनुपम ने किताब निकालने में भी शांति प्रतिष्ठान का पैसा नहीं लगाया. फोल्डर छपाया. संस्थाओं और पर्यावरण में रुचि रखने वाले लोगों से अग्रिम कीमत मंगवाई. उसी से कागज खरीदा, छपाई करवाई. फिर खुद ही चिट्ठी लिख-लिखकर किताब बेची. दो हजार छपवाई थी. साठ हजार लागत लगी. दो लाख कमाकर अनुपम ने प्रतिष्ठान में जमा करवा दिए. चार साल बाद ‘हमारा पर्यावरण’ निकाली, ‘देश का पर्यावरण’ से भी बेहतर. इसका भी फोल्डर छपवाकर अग्रिम कीमत इकट्ठी की. इस बार डेढ़ लाख के आसपास आई. छह हजार छपवाई. बिना किसी मदद से खुद चिट्ठियां लिखकर बेचीं. शांति प्रतिष्ठान को कमाकर दिए नौ लाख रुपये….अब ये दोनों किताबें दुर्लभ हो गई हैं. पर्यावरण मंत्री कमलनाथ को किसी को भेंट करने के लिए चाहिए थी. उनके दफ्तर ने बहुत फोन किए, मुश्किल से दो प्रतियां जुटीं. और मजा यह है कि पर्यावरण मंत्रालय ने इन पुस्तकों को नहीं खरीदा. हिन्दी के किसी भी राज्य ने किताबों की सरकारी खरीद में इसे नहीं लिया. किसी प्रकाशक ने वितरण और बिक्री में कोई मदद नहीं की. पिछले दस साल के देश के पर्यावरण पर हिन्दी में ऐसी किताबें नहीं निकलीं. अनुपम ने न सिर्फ लिखीं और छापीं, बेचीं भी और कोई 10 लाख कमा कर संस्था को दिया. हिन्दी के किसी प्रकाशक को चुल्लू भर पानी चाहिए तो पर्यावरण की ये दो पुस्तकें दे सकती हैं.”
और अब अनुपम मिश्र ने ‘आज भी खरे हैं तालाब’ निकाली है. यह संपादित नहीं है. सीधे अनुपम ने लिखी है – नाम कहीं अंदर है छोटा सा. लेकिन हिन्दी के चोटी के विद्वान ऐसी सीधी, सरल, आत्मीय और वाक्य में एक बात कहने वाली हिन्दी तो ज़रा लिखकर बताएं. जानकारी की तो बात ही नहीं कर रहा हूं. अनुपम ने तालाब को भारतीय समाज में रख कर देखा है. सम्मान से समझा है. अद्भुत जानकारी इकट्ठी की है और उसे मोतियों की तरह पिरोया है. कोई भारतीय ही तालाब के बारे में ऐसी किताब लिख सकता था. लेकिन भारतीय इंजीनियर नहीं, पर्यावरणविद नहीं, शोधक विद्वान नहीं – भारत के समाज और तालाब से उस के संबंध को सम्मान से समझने वाला विनम्र भारतीय….ऐसी सामग्री हिन्दी में ही नहीं,अंग्रेजी और किसी भी भारतीय भाषा में आप को तालाब पर नहीं मिलेगी. तालाब पानी का इंतजाम करने का पुण्य कर्म है तो इस देश के सभी लोगों ने किया है. उनको, उनके ज्ञान को और उनके समर्पण को बता सकने वाली एक यही किताब है. आप चाहें तो कलकत्ते के राष्ट्रीय ग्रंथागार देख लें. यह किताब भी इसी तरह निकाली है. तीन हजार छपवाई थीं. तीन महीने में दो हजार एक सौ बेच दी हैं. कोई डेढ़ लाख कमा कर जमा करवा दिया है. वृक्ष मित्र पुरस्कार जिस साल चला, अनुपम को दिया गया था. पर्यावरण का अनुपम, अनुपम मिश्र है. उस के जैसे व्यक्ति की पुण्याई पर हमारे जैसे लोग जी रहे हैं. यह उसका और हमारा – दोनों का सौभाग्य है. …मैं अनुपम जी के काम काज का सामान्य दर्शक रहा हूँ , प्रभाष जी ने जिन नमिता जी का जिक्र किया है मैं उनके विवाह मैं शामिल होने पहली बार दिल्ली आया तब भीड़ भाड़ में अनुपम जी से एक दो बार ही संक्षिप्त बात हुई । ज्यादा कुछ याद नहीं। विवाह के दौरान दिल्ली के प्रतिष्ठित साहित्यकारों और राजनेताओं को नजदीक से देखा । शारदा पाठक जी तब दिल्ली ज्ञान के संदर्भ मैं हमारे गुरु -गाइड बने तभी भवानी प्रसाद जी से भेंट हुई। बाद में जब दोबारा आया तब दिसंबर की ऐसी चंद सर्द रातें अनुपम जी के सानिध्य में बीतीं। तब वे किसी किताब पर काम कर रहे थे। बोले , देखते जाइये सब गौर से आपको बम्बई जाना हैं न शरद जोशी के पास ‘ हिंदी एक्सप्रेस ‘ के लिए , सब ऐसे ही करना होगा। … मैं बस देखता रहता हूँ ,स्वभावत: , ज्यादा चर्चा विमर्श में नहीं पड़ता।
सन 1980 से जारी यह यात्रा अभी जारी है , जब भी मिलते अपने आप दो बातें बताते रहते। टेड डॉट कॉम और इंडिया वॉटर पोर्टल के बारे बताया। जब भी उनके बारे में कुछ पढ़ते दो बातें और जान पाते हैं। पहले लगता था की वे सहज सरल हैं ,अब लगता वे अथाह हैं और कहीं कहीं गूढ़ भी।

(वरिष्ठ पत्रकार टिल्लन रिछारिया की शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ` मेरे आसपास के लोग’ से।)

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